दुनिया जीतने का हुनर सिखाते हैं अजीत सर! मुफ्त में गणित पढ़ने के लिए रोज आते हैं 200 बच्चे

जिले के एक सुदूर अंचल में बसे खैरा प्रखंड का गांव है केवाल फरियत्‍ता. इस गांव में 30 साल का दिव्‍यांग युवक अजीत अपने गांव के बच्‍चों को नि:शुल्‍क शिक्षा दे रहा है. अजीत बचपन से ही दोनों पैरों से दिव्यांग है. अजीत ने अपनी शिक्षा के लिए दिव्‍यांगता को बाधा नहीं बनने दिया. उसे खुद बीएससी की डिग्री हासिल की और अब गांव के छात्रों को पढ़ाकर शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ अपने परिवार का पालन-पोषण भी कर रहा है.

 

अजीत गांव के गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता है. अजीत की इच्‍छाशक्‍ति दर्शाती है कि दिव्यांग होने के बावजूद किसी पर बोझ बनकर जीना ही विकल्‍प नहीं है. अजीत पढ़ लिख कर काबिल बन अब गांव के बच्चों को काबिल बनाने में जुटा है. खुद को जमीन पर घसीट कर चलने वाला अजीत हर दिन 200 छात्र-छात्राओं को पढ़ाता है. अजीत सर की क्लास में पढ़ने वाले हो या फिर परिवार वाले सब इस युवक की प्रशंसा करते नहीं थकते.

गलत दवा के कारण हुए दिव्यांग

दरअसल जन्म लेने के सात महीने के बाद ही इलाज के दौरान गलत दवा के प्रभाव से अजीत दोनों पैर से अपाहिज हो गया. बावजूद इसके वह आगे बढ़ते गया. गांव के एक शख्स सूरज कुमार ने बताया कि अजीत को पढ़ाने के लिए उसके पिता गोद में उठाकर ले जाते थे. अपनी दिव्यांग संतान को काबिल बनाने के लिए अगर इसके मां-बाप ने साथ दिया तो उसने भी उन्हें निराश नहीं किया.

 

बिना फीस लिए मुफ्त में पढ़ाई

मगध यूनिवर्सिटी से अजीत ने गणित विषय से स्नातक किया. रोजगार के लिए कोशिश करने के साथ ही उसने गांव के बच्चे को ही पढ़ाने का ही मन बनाया. अजीत गांव के जिन दो सौ बच्चों को हर दिन पढ़ाता है, उनमें से कई गरीब बच्चे बिना फीस दिए ही शिक्षा प्राप्‍त करते हैं. अजीत आज परिवार का पालन पोषण भी वह खुद कर रहा है. उसके बुजुर्ग पिता बीमार रहते हैं. छोटे भाई-बहन का भविष्य बनाने की जिम्मेदारी भी अजीत के कंधों पर है.

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