सपनों को पंख देने में जुटी 10 साल की दिव्‍यांग बच्‍ची, जानें अनपढ़ माता-पिता की बिटिया की अनोखी कहानी

देश और दुनिया में बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जो विपरीत परिस्थित‍ियों के बावजूद अपने हौसले से सफलता की कहानी लिखते हैं. बड़ी संख्‍या ऐसे लोगों की भी है जो तमाम तरह की कठिनाइयों के होते हुए भी अपने सपनों को पूरा करने में जुटे हैं. ये लोग सैकड़ों-हजारों अन्‍य लोगों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन जाते हैं. आज हम आपको एक ऐसी ही कहानी बताने जा रहे हैं, जिसमें निरक्षर माता-प‍िता की दिव्‍यांग बेटी तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपने सपनों को पंख देने में जुटी है. महादलित समुदाय से आने वाली इस छात्रा का सपना पढ़-लिखकर अच्‍छा टीचर बनने की है. इसके लिए वह हर तरह की कठिनाइयों को पार करते हुए पगडंडियों के सहारे तकरीबन 500 मीटर की दूरी तय कर पढ़ने के लिए स्‍कूल जाती है.

 

सड़क हादसे में एक पांव गंवाने वाली 10 वर्षीय सीमा तमाम दुश्‍वारियों के बावजूद रोजाना स्‍कूल जाती है. शारीरिक लाचारी के चलते कई लोग हिम्‍मत हार जाते हैं, लेकन जमुई जिले के खैरा प्रखंड के फतेहपुर गांव निवासी सीमा की कहानी वैसे लोगों से बिल्‍कुल अलग है. गरीब महादलित परिवार में पैदा हुई सीमा ने सड़क हादसे में एक पैरा गंवा दी थी. इसके बावजूद उसके अंदर पढ़ने का जुनून कम नहीं हुआ. सीमा एक पैर से पूरी तरह दिव्यांग है. वह पढ़-लिखकर काबिल टीचर बनना चाहती है. यही वजह है कि यह सीमा खेतों में बनी पगडंडियों के सहारे हर दिन 500 मीटर की दूरी तय कर स्कूल जाती है और फिर उतनी ही दूरी तय कर वापस घर आती है.

2 साल पहले गंवाया था पैर

दरअसल, सीमा 2 साल पहले गांव में ही एक हादसे का शिकार हो गई थी. उसकी जान बचाने के लिए डॉक्टर ने उसका एक पैर काट दिया था. दो साल पहले यह बच्ची एक ट्रैक्टर की चपेट में आ गई थी, जिसमें उसके एक पैर में गंभीर चोटें आई थीं. सीमा को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां डॉक्टर ने उसकी जान बचाने के लिए जख्मी पैर को काट दिया था. ठीक होने के बाद यह बच्ची एक पैर से ही अपना सारा काम करती है. यहां तक कि वह एक पैर पर घंटों खड़ी भी रहती है.

 

माता-पिता करते हैं मजदूरी

फतेहपुर गांव के सरकारी स्कूल में चौथी कक्षा की छात्रा सीमा के माता-पिता मजदूरी करते हैं. उसके पिता खीरन मांझी दूसरे प्रदेश में मजदूरी करते हैं. पांच भाई-बहन में एक सीमा किसी पर अब तक बोझ नहीं बनी है. एक पैर होने के बावजूद सीमा में पढ़ने-लिखने का जुनून है. यही कारण है कि शारीरिक लाचारी को भुलाकर यह बच्ची बुलंद हौसले के साथ स्कूल जा रही है. पगडंडी पर जिस तरह से चलकर यह बच्ची स्कूल जाती है उसे देख सब हैरान हो जाते हैं. दिव्यांग सीमा का कहना है कि उसके मां-बापू मजदूर हैं. वे पढ़े-लिखे भी नहीं हैं. वह पढ़-लिखकर काबिल बनना चाहती है. यही कारण है कि सीमा ने जिद कर स्कूल में नाम लिखवाया और हर दिन स्कूल पढ़ने जाती है. वह टीचर बनना चाहती है, ताकि परिवार की मदद कर सकें.

 

क्‍या कहते हैं टीचर?

मध्य विद्यालय फतेहपुर के शिक्षक गौतम कुमार गुप्ता का कहना है कि दिव्यांग होने के बाद भी सीमा एक पैर से पगडंडियों के सहारे स्कूल आती है. उन्‍होंने बताया कि दिव्‍यांग होने के बावजूद चौथी क्‍लास की छात्रा सीमा अपना काम खुद करती हैं. बुलंद हौसले वाली बच्ची सीमा की मां बेबी देवी ने बताया को वे लोग गरीब हैं. गांव के बच्चे को स्कूल जाते देख सीमा ने भी जिद की थी, जिसके कारण स्कूल में नाम लिखवाना पड़ा. उन्‍होंने बताया कि उनके पास उतने पैसे भी नहीं हैं कि वह अपनी बेटी के लिए क‍िताबें खरीद सकें, लेकिन स्कूल के शिक्षक सब मुहैया करवा रहे हैं. उन्‍हें अपनी बेटी पर गर्व है.

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